Saturday, April 18, 2026

Muskura ke

मैं बिकने तो नहीं जाता हूं बाजार में।

फिर भी वो खरीद लेती है मुस्कुरा के मुझे।।


मैं दरवाज़ा ही नहीं खोलता हूं यादों की दस्तक पर 

वो फिर भी रुला देती हैं गुदगुदा के मुझे


मैं तो कभी तेरे इम्तिहान में बैठा भी नहीं

ज़िन्दगी, जाने क्या देखती है आज़मा के मुझे 


मैं तो उसके एक इशारे पे चला आऊं

जाने क्यों बुलाती है पास आ के मुझे


मेरी आंखों से कहां मोती टपकते हैं

क्याही मिलेगा उसे रुला के मुझे


उस से मिलने के लिए फक्त जागता रहा 

और वो ख़्वाब में ले गई बस सुला के मुझे

Nahi ki

उसने कहा था नींद नहीं आती तो छत पर आ जाती हूं

बस तबसे हमने सोते सोते कभी सुबह नहीं की


सारी महफिल तिरछी निगाह से उसको देखती रही 

बस इसलिए उसने इस तरफ निगाह नहीं की


कुछ तो लगा होगा जो वो जाते जाते रूक गए

वैसे उसने कभी मेरे शेर पर वाह नहीं की


उसने नजरें नीचे की और मुस्कुरा के चल दी 

बस तबसे हमने वाह की परवाह नहीं की


मोहब्बत करने की चीज है सो कर ली 

किसी को पाने में ज़िंदगी तबाह नहीं की

Dil bahlane ke liye

वो संगदिल पूछता है क्या करूं दिल बहलाने के लिए 

अरे दिल भी तो होना चाहिए न दिल बहलाने के लिए 


ये क्या ग़ज़ब शह है कि दिल ही चुरा लो किसी का

पर अब दिल तो चाहिए न दिल बहलाने के लिए 


उसने कोशिश की पर इश्क़ न दे सका मुझे

फिर उसने शायरी दे दी दिल बहलाने के लिए


वो आंख मूंद के जाने क्या ख्वाब बुनता है

दुनिया का तमाशा क्या कम है दिल बहलाने के लिए


कोई ख़्वाब को हक़ीक़त कोई हासिल को ख़ाक बना रहा है

इंसान क्या क्या नहीं करता दिल बहलाने के लिए 


एक तस्वीर जान बूझ कर मैंने खो दी थी

कभी वो ढूंढने लगता हूं दिल बहलाने के लिए


मैं रूह के ज़ख्मों पे अल्फ़ाज़ का मरहम करता हूं

नहीं करता में शायरी फ़ख्त दिल बहलाने के लिए 


दिल बहला के खैर क्या हासिल होगा उज्ज्वल

दिल बहला के फिर देखते है दिल बहलाने के लिए


Muskura ke

मैं बिकने तो नहीं जाता हूं बाजार में। फिर भी वो खरीद लेती है मुस्कुरा के मुझे।। मैं दरवाज़ा ही नहीं खोलता हूं यादों की दस्तक पर  वो फिर भी र...

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