वो संगदिल पूछता है क्या करूं दिल बहलाने के लिए
अरे दिल भी तो होना चाहिए न दिल बहलाने के लिए
ये क्या ग़ज़ब शह है कि दिल ही चुरा लो किसी का
पर अब दिल तो चाहिए न दिल बहलाने के लिए
उसने कोशिश की पर इश्क़ न दे सका मुझे
फिर उसने शायरी दे दी दिल बहलाने के लिए
वो आंख मूंद के जाने क्या ख्वाब बुनता है
दुनिया का तमाशा क्या कम है दिल बहलाने के लिए
कोई ख़्वाब को हक़ीक़त कोई हासिल को ख़ाक बना रहा है
इंसान क्या क्या नहीं करता दिल बहलाने के लिए
एक तस्वीर जान बूझ कर मैंने खो दी थी
कभी वो ढूंढने लगता हूं दिल बहलाने के लिए
मैं रूह के ज़ख्मों पे अल्फ़ाज़ का मरहम करता हूं
नहीं करता में शायरी फ़ख्त दिल बहलाने के लिए
दिल बहला के खैर क्या हासिल होगा उज्ज्वल
दिल बहला के फिर देखते है दिल बहलाने के लिए
No comments:
Post a Comment