न इधर उम्मीद-ए-वफ़ा है न उधर कोई प्यार में है,
खुश हैं ये अदाकार हीर-रांझे के क़िरदार में हैं
बुझा आया वो फुरकत के अंगारों को,
मय का क़तरा आज समंदर के क़िरदार में है
सबपे भरोसा और सब पे शुबा रखता हूं,
कौन जाने कौन किसके किरदार में है
जाने कब से कश्ति मेरी मझधार में है,
नाखुदा जब से खुदा के किरदार में है
पानी दिखा के प्यासा रखते हैं दोनों
सेहरा ओ समंदर दोनों एक ही क़िरदार में हैं
इस मिसरे पे पूरा नाम लुटा दो उज्ज्वल
ये एक शेर पूरी ग़ज़ल के किरदार में है