Saturday, August 22, 2026

Tareeqay

ख्वाब भी हमको सलीके से नहीं आते 

तरीके से देखता हूं पर तरीके से नहीं आते


घुसा है दिल में तसव्वुर नीमकश 

तीर भी आर-पार तरीके से नहीं आते


पुरानी तालीम है मेरी पुराने मेरे तौर

मुझे नए जमाने के तरीके से नहीं आते


मरासिम न हुए गणित के सवाल हो गये 

आते तो हैं समझ पर तरीके से नहीं आते


इश्क़ करूं या रश्क करूं उस सादगी से

बहाने बनाने भी उन्हें तरीके से नहीं आते 


मेरे पास आते ही उन्हें घड़ी से प्यार हो जाता है

आते तो हैं मिलने पर तरीके से नहीं आते

Kaise

 जिंदगी चढ़ा देती है जिसको अर्श पर 

वो टूटा हुआ तारा कैसे हो जाता है 


मैंने अपना लिये थे कुछ ग़म

ये ग़म इतना सारा कैसे हो जाता है 


पी के पानी मीठी नदियों का 

समंदर और भी खारा कैसे हो जाता है 


दे के आंसू, कर के रंजिश

सितमगर और भी प्यारा कैसे हो जाता है

Friday, August 21, 2026

Mat karna

मन में उबाल आये तो खुद से सवाल मत करना

उफन जाना, सुलग सुलग कर मलाल मत करना


तुम बादल हो, खुद तय करो कब करनी है बारिश

लोग तो यही कहेंगे कि फिलहाल मत करना


दोस्तों में भी उसे दुश्मन नज़र आने लगे 

किसी दुश्मन का भी ऐसा हाल मत करना


मैं गुनहगार हूं तुम्हारा, बेशक़ क़त्ल करो

मगर एक बार में करना, हलाल मत करना


बवाल वाइज़ों से होता है बावलों से नहीं

सिर्फ बवाल करने के लिए बवाल मत करना

Thursday, August 20, 2026

Qirdaar

न इधर उम्मीद-ए-वफ़ा है न उधर कोई प्यार में है,

खुश हैं ये अदाकार हीर-रांझे के क़िरदार में हैं


बुझा आया वो फुरकत के अंगारों को,

मय का क़तरा आज समंदर के क़िरदार में है 


सबपे भरोसा और सब पे शुबा रखता हूं,

कौन जाने कौन किसके किरदार में है


जाने कब से कश्ति मेरी मझधार में है,

नाखुदा जब से खुदा के किरदार में है


पानी दिखा के प्यासा रखते हैं दोनों 

सेहरा ओ समंदर दोनों एक ही क़िरदार में हैं


कभी कभी तो मुझे भी हाथों खिला देती है

मेरी शरीक-ए-हयात अभी माँ के किरदार में है


इस मिसरे पे पूरा नाम लुटा दो उज्ज्वल 

ये एक शेर पूरी ग़ज़ल के किरदार में है

Bas tere liye

तूफानों से भी अच्छे रिश्ते बनाए रक्खे हैं

लौ के लिए हाथों से फानूस बनाए रक्खे हैं


बस ये मत समझना ये मेरे लिए आसान है 

तेरे फूलों के लिए कुछ काँटे अपनाये रक्खे हैँ 


हर सख्ती के पीछे एक बंधा हुआ इंसान है 

संगदिल नहीं हूं दिल पे पत्थर जमाये रक्खे हैं


रोज़ जाग रहा हूं चंद जुगनुओं के लिए 

मेंरे बिस्तर पे तेरे सपने सुलाए रक्खे हैं 


बहुत सताता है मुझे खामोशी का शोर 

तेरी शिकायतो में अपने शिक़वे भुलाये रक्खे हैं


मैं आगे खड़ा हूं कुछ तीर लेने के लिए 

अपने जूतों में मैंने छाले छिपाये रक्खे हैं


तुम्हारे ख़ाबो की मुझे भी है परवाह 

बस जेब में आज के निवाले बचाये रक्खे हैं

Saturday, April 18, 2026

Muskura ke

मैं बिकने तो नहीं जाता हूं बाजार में।

फिर भी वो खरीद लेती है मुस्कुरा के मुझे।।


मैं दरवाज़ा ही नहीं खोलता हूं यादों की दस्तक पर 

वो फिर भी रुला देती हैं गुदगुदा के मुझे


मैं तो कभी तेरे इम्तिहान में बैठा भी नहीं

ज़िन्दगी, जाने क्या देखती है आज़मा के मुझे 


मैं तो उसके एक इशारे पे चला आऊं

जाने क्यों बुलाती है पास आ के मुझे


मेरी आंखों से कहां मोती टपकते हैं

क्याही मिलेगा उसे रुला के मुझे


उस से मिलने के लिए फक्त जागता रहा 

और वो ख़्वाब में ले गई बस सुला के मुझे

Nahi ki

उसने कहा था नींद नहीं आती तो छत पर आ जाती हूं

बस तबसे हमने सोते सोते कभी सुबह नहीं की


सारी महफिल तिरछी निगाह से उसको देखती रही 

बस इसलिए उसने इस तरफ निगाह नहीं की


कुछ तो लगा होगा जो वो जाते जाते रूक गए

वैसे उसने कभी मेरे शेर पर वाह नहीं की


उसने नजरें नीचे की और मुस्कुरा के चल दी 

बस तबसे हमने वाह की परवाह नहीं की


मोहब्बत करने की चीज है सो कर ली 

किसी को पाने में ज़िंदगी तबाह नहीं की

Tareeqay

ख्वाब भी हमको सलीके से नहीं आते  तरीके से देखता हूं पर तरीके से नहीं आते घुसा है दिल में तसव्वुर नीमकश  तीर भी आर-पार तरीके से नहीं आते पुरा...

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