Thursday, August 20, 2026

Qirdaar

न इधर उम्मीद-ए-वफ़ा है न उधर कोई प्यार में है,

खुश हैं ये अदाकार हीर-रांझे के क़िरदार में हैं


बुझा आया वो फुरकत के अंगारों को,

मय का क़तरा आज समंदर के क़िरदार में है 


सबपे भरोसा और सब पे शुबा रखता हूं,

कौन जाने कौन किसके किरदार में है


जाने कब से कश्ति मेरी मझधार में है,

नाखुदा जब से खुदा के किरदार में है


पानी दिखा के प्यासा रखते हैं दोनों 

सेहरा ओ समंदर दोनों एक ही क़िरदार में हैं


इस मिसरे पे पूरा नाम लुटा दो उज्ज्वल 

ये एक शेर पूरी ग़ज़ल के किरदार में है

Bas tere liye

बस ये मत समझना ये मेरे लिए आसान है 

तेरे फूलों के लिए कुछ काँटे अपनाये रक्खे हैँ 


हर सख्ती के पीछे एक बंधा हुआ इंसान है 

संगदिल नहीं हूं दिल पे पत्थर जमाये रक्खे हैं


रोज़ जाग रहा हूं चंद जुगनुओं के लिए 

मेंरे बिस्तर पे तेरे सपने सुलाए रक्खे हैं 


बहुत सताता है मुझे खामोशी का शोर 

तेरी शिकायतो में अपने शिक़वे भुलाये रक्खे हैं


मैं आगे खड़ा हूं कुछ तीर लेने के लिए 

अपने जूतों में मैंने छाले छिपाये रक्खे हैं


तुम्हारे ख़ाबो की मुझे भी है परवाह 

बस जेब में आज के निवाले बचाये रक्खे हैं

Saturday, April 18, 2026

Muskura ke

मैं बिकने तो नहीं जाता हूं बाजार में।

फिर भी वो खरीद लेती है मुस्कुरा के मुझे।।


मैं दरवाज़ा ही नहीं खोलता हूं यादों की दस्तक पर 

वो फिर भी रुला देती हैं गुदगुदा के मुझे


मैं तो कभी तेरे इम्तिहान में बैठा भी नहीं

ज़िन्दगी, जाने क्या देखती है आज़मा के मुझे 


मैं तो उसके एक इशारे पे चला आऊं

जाने क्यों बुलाती है पास आ के मुझे


मेरी आंखों से कहां मोती टपकते हैं

क्याही मिलेगा उसे रुला के मुझे


उस से मिलने के लिए फक्त जागता रहा 

और वो ख़्वाब में ले गई बस सुला के मुझे

Nahi ki

उसने कहा था नींद नहीं आती तो छत पर आ जाती हूं

बस तबसे हमने सोते सोते कभी सुबह नहीं की


सारी महफिल तिरछी निगाह से उसको देखती रही 

बस इसलिए उसने इस तरफ निगाह नहीं की


कुछ तो लगा होगा जो वो जाते जाते रूक गए

वैसे उसने कभी मेरे शेर पर वाह नहीं की


उसने नजरें नीचे की और मुस्कुरा के चल दी 

बस तबसे हमने वाह की परवाह नहीं की


मोहब्बत करने की चीज है सो कर ली 

किसी को पाने में ज़िंदगी तबाह नहीं की

Dil bahlane ke liye

वो संगदिल पूछता है क्या करूं दिल बहलाने के लिए 

अरे दिल भी तो होना चाहिए न दिल बहलाने के लिए 


ये क्या ग़ज़ब शह है कि दिल ही चुरा लो किसी का

पर अब दिल तो चाहिए न दिल बहलाने के लिए 


उसने कोशिश की पर इश्क़ न दे सका मुझे

फिर उसने शायरी दे दी दिल बहलाने के लिए


वो आंख मूंद के जाने क्या ख्वाब बुनता है

दुनिया का तमाशा क्या कम है दिल बहलाने के लिए


कोई ख़्वाब को हक़ीक़त कोई हासिल को ख़ाक बना रहा है

इंसान क्या क्या नहीं करता दिल बहलाने के लिए 


एक तस्वीर जान बूझ कर मैंने खो दी थी

कभी वो ढूंढने लगता हूं दिल बहलाने के लिए


मैं रूह के ज़ख्मों पे अल्फ़ाज़ का मरहम करता हूं

नहीं करता में शायरी फ़ख्त दिल बहलाने के लिए 


दिल बहला के खैर क्या हासिल होगा उज्ज्वल

दिल बहला के फिर देखते है दिल बहलाने के लिए


Tuesday, December 16, 2025

Mulaaqat ke baad

अपने चेहरे के तासुर को थोड़ा बदल लेने दो।

मैं उनसे मिल के आया हूं थोड़ा संभल लेने दो। 


किसको समझाऊंगा गालों पे ये सुर्खी क्या है

अपने चेहरे पे पानी भी थोड़ा मल लेने दो 


लोग पहचान लेंगे मेरा हाल सांसों की तेजी से

अपने दिल की बगावत को थोड़ा कुचल लेने दो


अभी तो बाकी है उनके छुवन का एहसास हाथों में,

अभी उनकी सांसों की गुनगुनाहट में थोड़ा पिघल लेने दो। 


मुझे समझाओ, उनकी शोख निगाहों पे ना मचल लेने दो।

बड़ा कमज़ोर है दिल, इसको न फिसल लेने दो


दो लम्हों में मैंने जिंदगी गुज़ार ली है उज्ज्वल 

उन्ही यादों की तंग गलियों से फिर गुजर लेने दो।

Saturday, December 6, 2025

Hisaab Maang Rahi thi

 वो मुझसे मेरी मोहब्बत का जवाब मांग रही थी 

पगली, बारिश से बूंदों का हिसाब मांग रही थी


जिनसे सीखा है आम की कैरियों नै लटकना 

उन झुमकों की लटक को वो खराब मान रही थी


आदतन आज फिर खाली हाथ चली आई

मेरी कब्र पर, वो पड़ोसी से ग़ुलाब मांग रही थी


समंदर की कोख से बनाया है बादलों को जिसने

वो धरती, फिर आसमानों से सहाब मांग रही थी


आंखों से पीने पिलाने का अपना और मजा है

एक रोज साक़ी खुद मुझसे शराब मांग रही थी

Qirdaar

न इधर उम्मीद-ए-वफ़ा है न उधर कोई प्यार में है, खुश हैं ये अदाकार हीर-रांझे के क़िरदार में हैं बुझा आया वो फुरकत के अंगारों को, मय का क़तरा आज...

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