हर आदमी जो परेशान है
वो परेशान रहना भी चाहता है
वो डूब रहा है मझधार में पर
वो दरिया में बहना भी चाहता है
मालूम है बात कहने से क्या होगा
पर वो सुखन कहना भी चाहता है
अंगारे साफ नजर आ रहे हैं राहों में
पर वो जलन सहना भी चाहता है
A potpourri of my original thoughts, ideas, and literary musings in English, Hindi, and Urdu.
हर आदमी जो परेशान है
वो परेशान रहना भी चाहता है
वो डूब रहा है मझधार में पर
वो दरिया में बहना भी चाहता है
मालूम है बात कहने से क्या होगा
पर वो सुखन कहना भी चाहता है
अंगारे साफ नजर आ रहे हैं राहों में
पर वो जलन सहना भी चाहता है
हमने रखा था तुमको ज़माने से पहले
तुम भी सोच लेते आज़माने से पहले
बड़ी छटपटाहट में निकलते हैं दिन तेरे बिन
कोई इशारा कर दिया कर न आने के पहले
चलो मैं भूल जाऊंगा तुमने क्या बोला था
एक बार सच बोल दो बहाने से पहले
इसी गुमाँ ने कितनी जवानियाँ खराब कर दी
उसने आँख मिलायी तो थी आँख चुराने से पहले
मेरा हश्र वही होगा जो हर परवाने का होता है
अपनी सोच लो मुझको जलाने से पहले
ये रूठने मनाने का खेल मुझे आता ही नहीं
मैं तो मान जाता हूं तेरे मनाने से पहले
ये तो अब है जो तुमको फ़ासिले चाहिए
सोचना चाहिए था मुझमे समाने से पहले
हम निशानी समझ के जो दे रहे थे
वो नादानी समझ के मिटा रहे थे
हटा के चश्मा नज़र से मेरी
वो रंग अपने दिखा रहे थे
वो पूछ रहे थे नाम हमारा
हम उनको अपना बता रहे थे
दफ़्न कर चुके थे वो एहसास सारे
बस मरासिम को सूली चढ़ा रहे थे
मैं उम्मीद पूरी कर रहा था उनकी
वो वादा अपना निभा रहे थे
चिता पर भी वो खुली आंखों से लेटा
कोई ख़्वाब उसको सता रहे थे
ख्वाब भी हमको सलीके से नहीं आते
तरीके से देखता हूं पर तरीके से नहीं आते
घुसा है दिल में तसव्वुर नीमकश
तीर भी आर-पार तरीके से नहीं आते
पुरानी तालीम है मेरी पुराने मेरे तौर
मुझे नए जमाने के तरीके से नहीं आते
मरासिम न हुए गणित के सवाल हो गये
आते तो हैं समझ पर तरीके से नहीं आते
इश्क़ करूं या रश्क करूं उस सादगी से
बहाने बनाने भी उन्हें तरीके से नहीं आते
मेरे पास आते ही उन्हें घड़ी से प्यार हो जाता है
आते तो हैं मिलने पर तरीके से नहीं आते
जिंदगी चढ़ा देती है जिसको अर्श पर
वो टूटा हुआ तारा कैसे हो जाता है
मैंने अपना लिये थे कुछ ग़म
ये ग़म इतना सारा कैसे हो जाता है
पी के पानी मीठी नदियों का
समंदर और भी खारा कैसे हो जाता है
दे के आंसू, कर के रंजिश
सितमगर और भी प्यारा कैसे हो जाता है
मन में उबाल आये तो खुद से सवाल मत करना
उफन जाना, सुलग सुलग कर मलाल मत करना
तुम बादल हो, खुद तय करो कब करनी है बारिश
लोग तो यही कहेंगे कि फिलहाल मत करना
दोस्तों में भी उसे दुश्मन नज़र आने लगे
किसी दुश्मन का भी ऐसा हाल मत करना
मैं गुनहगार हूं तुम्हारा, बेशक़ क़त्ल करो
मगर एक बार में करना, हलाल मत करना
बवाल वाइज़ों से होता है बावलों से नहीं
सिर्फ बवाल करने के लिए बवाल मत करना
न इधर उम्मीद-ए-वफ़ा है न उधर कोई प्यार में है,
खुश हैं ये अदाकार हीर-रांझे के क़िरदार में हैं
बुझा आया वो फुरकत के अंगारों को,
मय का क़तरा आज समंदर के क़िरदार में है
सबपे भरोसा और सब पे शुबा रखता हूं,
कौन जाने कौन किसके किरदार में है
जाने कब से कश्ति मेरी मझधार में है,
नाखुदा जब से खुदा के किरदार में है
पानी दिखा के प्यासा रखते हैं दोनों
सेहरा ओ समंदर दोनों एक ही क़िरदार में हैं
कभी कभी तो मुझे भी हाथों खिला देती है
मेरी शरीक-ए-हयात अभी माँ के किरदार में है
इस मिसरे पे पूरा नाम लुटा दो उज्ज्वल
ये एक शेर पूरी ग़ज़ल के किरदार में है
तूफानों से भी अच्छे रिश्ते बनाए रक्खे हैं
लौ के लिए हाथों से फानूस बनाए रक्खे हैं
बस ये मत समझना ये मेरे लिए आसान है
तेरे फूलों के लिए कुछ काँटे अपनाये रक्खे हैँ
हर सख्ती के पीछे एक बंधा हुआ इंसान है
संगदिल नहीं हूं दिल पे पत्थर जमाये रक्खे हैं
रोज़ जाग रहा हूं चंद जुगनुओं के लिए
मेंरे बिस्तर पे तेरे सपने सुलाए रक्खे हैं
बहुत सताता है मुझे खामोशी का शोर
तेरी शिकायतो में अपने शिक़वे भुलाये रक्खे हैं
मैं आगे खड़ा हूं कुछ तीर लेने के लिए
अपने जूतों में मैंने छाले छिपाये रक्खे हैं
तुम्हारे ख़ाबो की मुझे भी है परवाह
बस जेब में आज के निवाले बचाये रक्खे हैं
मैं बिकने तो नहीं जाता हूं बाजार में।
फिर भी वो खरीद लेती है मुस्कुरा के मुझे।।
मैं दरवाज़ा ही नहीं खोलता हूं यादों की दस्तक पर
वो फिर भी रुला देती हैं गुदगुदा के मुझे
मैं तो कभी तेरे इम्तिहान में बैठा भी नहीं
ज़िन्दगी, जाने क्या देखती है आज़मा के मुझे
मैं तो उसके एक इशारे पे चला आऊं
जाने क्यों बुलाती है पास आ के मुझे
मेरी आंखों से कहां मोती टपकते हैं
क्याही मिलेगा उसे रुला के मुझे
उस से मिलने के लिए फक्त जागता रहा
और वो ख़्वाब में ले गई बस सुला के मुझे
उसने कहा था नींद नहीं आती तो छत पर आ जाती हूं
बस तबसे हमने सोते सोते कभी सुबह नहीं की
सारी महफिल तिरछी निगाह से उसको देखती रही
बस इसलिए उसने इस तरफ निगाह नहीं की
कुछ तो लगा होगा जो वो जाते जाते रूक गए
वैसे उसने कभी मेरे शेर पर वाह नहीं की
उसने नजरें नीचे की और मुस्कुरा के चल दी
बस तबसे हमने वाह की परवाह नहीं की
मोहब्बत करने की चीज है सो कर ली
किसी को पाने में ज़िंदगी तबाह नहीं की
वो संगदिल पूछता है क्या करूं दिल बहलाने के लिए
अरे दिल भी तो होना चाहिए न दिल बहलाने के लिए
ये क्या ग़ज़ब शह है कि दिल ही चुरा लो किसी का
पर अब दिल तो चाहिए न दिल बहलाने के लिए
उसने कोशिश की पर इश्क़ न दे सका मुझे
फिर उसने शायरी दे दी दिल बहलाने के लिए
वो आंख मूंद के जाने क्या ख्वाब बुनता है
दुनिया का तमाशा क्या कम है दिल बहलाने के लिए
कोई ख़्वाब को हक़ीक़त कोई हासिल को ख़ाक बना रहा है
इंसान क्या क्या नहीं करता दिल बहलाने के लिए
एक तस्वीर जान बूझ कर मैंने खो दी थी
कभी वो ढूंढने लगता हूं दिल बहलाने के लिए
मैं रूह के ज़ख्मों पे अल्फ़ाज़ का मरहम करता हूं
नहीं करता में शायरी फ़ख्त दिल बहलाने के लिए
दिल बहला के खैर क्या हासिल होगा उज्ज्वल
दिल बहला के फिर देखते है दिल बहलाने के लिए
हर आदमी जो परेशान है वो परेशान रहना भी चाहता है वो डूब रहा है मझधार में पर वो दरिया में बहना भी चाहता है मालूम है बात कहने से क्या होगा प...