मैं बिकने तो नहीं जाता हूं बाजार में।
फिर भी वो खरीद लेती है मुस्कुरा के मुझे।।
मैं दरवाज़ा ही नहीं खोलता हूं यादों की दस्तक पर
वो फिर भी रुला देती हैं गुदगुदा के मुझे
मैं तो कभी तेरे इम्तिहान में बैठा भी नहीं
ज़िन्दगी, जाने क्या देखती है आज़मा के मुझे
मैं तो उसके एक इशारे पे चला आऊं
जाने क्यों बुलाती है पास आ के मुझे
मेरी आंखों से कहां मोती टपकते हैं
क्याही मिलेगा उसे रुला के मुझे
उस से मिलने के लिए फक्त जागता रहा
और वो ख़्वाब में ले गई बस सुला के मुझे
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