मुसलसल निगाहों से छलक रही है शराब
ये जहां होश में आये तो आए कैसे
वो कुछ कहते भी नहीं और सुनते भी नहीं
उनके मतलब की बात उनको बताएं कैसे
उनकी ज़ुल्फ़ लगती है बहते पानी की तरह
सराब दिखता है पर सराब मिल जाये कैसे
सुर्ख लब आखिरी शम्मा हो किसी महफ़िल की
तरसते को और तरसता कर आये कैसे
सादा दिल रखता है गुलाबी तेरे आरिज़ को
उनपे कोई और रंग अब जमाएं कैसे
शाइस्ता लोग भी अपना अदब भूल जाते है
वो जब हंसती है तो नज़र अपनी हटाये कैसे
तेरे घर के किनारे से गुज़रती है खिज़ा
तू जहाँ रहती है वहाँ फूल मुरझाये कैसे
तू सो जाए तो रात की ज़ीनत निखरती है
तू जागती हो तो चांद सितारे नज़र आएं कैसे
कभी लगता है कि सच तो तुम हो नहीं सकती
पर तुम ख़्याल हो तो सबको नज़र आये कैसे
एक गली दूर का रिश्ता था एक गली दूर ही रहा
उलझन ये कि मैं वहां आऊं कैसे तू यहाँ आये कैसे
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