Thursday, August 20, 2026

Qirdaar

न इधर उम्मीद-ए-वफ़ा है न उधर कोई प्यार में है,

खुश हैं ये अदाकार हीर-रांझे के क़िरदार में हैं


बुझा आया वो फुरकत के अंगारों को,

मय का क़तरा आज समंदर के क़िरदार में है 


सबपे भरोसा और सब पे शुबा रखता हूं,

कौन जाने कौन किसके किरदार में है


जाने कब से कश्ति मेरी मझधार में है,

नाखुदा जब से खुदा के किरदार में है


पानी दिखा के प्यासा रखते हैं दोनों 

सेहरा ओ समंदर दोनों एक ही क़िरदार में हैं


इस मिसरे पे पूरा नाम लुटा दो उज्ज्वल 

ये एक शेर पूरी ग़ज़ल के किरदार में है

Bas tere liye

बस ये मत समझना ये मेरे लिए आसान है 

तेरे फूलों के लिए कुछ काँटे अपनाये रक्खे हैँ 


हर सख्ती के पीछे एक बंधा हुआ इंसान है 

संगदिल नहीं हूं दिल पे पत्थर जमाये रक्खे हैं


रोज़ जाग रहा हूं चंद जुगनुओं के लिए 

मेंरे बिस्तर पे तेरे सपने सुलाए रक्खे हैं 


बहुत सताता है मुझे खामोशी का शोर 

तेरी शिकायतो में अपने शिक़वे भुलाये रक्खे हैं


मैं आगे खड़ा हूं कुछ तीर लेने के लिए 

अपने जूतों में मैंने छाले छिपाये रक्खे हैं


तुम्हारे ख़ाबो की मुझे भी है परवाह 

बस जेब में आज के निवाले बचाये रक्खे हैं

Qirdaar

न इधर उम्मीद-ए-वफ़ा है न उधर कोई प्यार में है, खुश हैं ये अदाकार हीर-रांझे के क़िरदार में हैं बुझा आया वो फुरकत के अंगारों को, मय का क़तरा आज...

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