हम निशानी समझ के जो दे रहे थे
वो नादानी समझ के मिटा रहे थे
चिता पर भी वो खुली आंखों से लेटा
कोई ख़्वाब उसको सता रहे थे
हटा के चश्मा नज़र से मेरी
वो रंग अपने दिखा रहे थे
वो पूछ रहे थे नाम हमारा
हम उनको अपना बता रहे थे
दफ़्न कर चुके थे वो एहसास सारे
बस मरासिम को सूली चढ़ा रहे थे
मैं उम्मीद पूरी कर रहा था उनकी
वो वादा अपना निभा रहे थे
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