बस ये मत समझना ये मेरे लिए आसान है
तेरे फूलों के लिए कुछ काँटे अपनाये रक्खे हैँ
हर सख्ती के पीछे एक बंधा हुआ इंसान है
संगदिल नहीं हूं दिल पे पत्थर जमाये रक्खे हैं
रोज़ जाग रहा हूं चंद जुगनुओं के लिए
मेंरे बिस्तर पे तेरे सपने सुलाए रक्खे हैं
बहुत सताता है मुझे खामोशी का शोर
तेरी शिकायतो में अपने शिक़वे भुलाये रक्खे हैं
मैं आगे खड़ा हूं कुछ तीर लेने के लिए
अपने जूतों में मैंने छाले छिपाये रक्खे हैं
तुम्हारे ख़ाबो की मुझे भी है परवाह
बस जेब में आज के निवाले बचाये रक्खे हैं
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