जिंदगी चढ़ा देती है जिसको अर्श पर
वो टूटा हुआ तारा कैसे हो जाता है
मैंने अपना लिये थे कुछ ग़म
ये ग़म इतना सारा कैसे हो जाता है
पी के पानी मीठी नदियों का
समंदर और भी खारा कैसे हो जाता है
दे के आंसू, कर के रंजिश
सितमगर और भी प्यारा कैसे हो जाता है
A potpourri of my original thoughts, ideas, and literary musings in English, Hindi, and Urdu.
ख्वाब भी हमको सलीके से नहीं आते तरीके से देखता हूं पर तरीके से नहीं आते घुसा है दिल में तसव्वुर नीमकश तीर भी आर-पार तरीके से नहीं आते पुरा...
No comments:
Post a Comment