जिंदगी चढ़ा देती है जिसको अर्श पर
वो टूटा हुआ तारा कैसे हो जाता है
मैंने अपना लिये थे कुछ ग़म
ये ग़म इतना सारा कैसे हो जाता है
पी के पानी मीठी नदियों का
समंदर और भी खारा कैसे हो जाता है
दे के आंसू, कर के रंजिश
सितमगर और भी प्यारा कैसे हो जाता है
A potpourri of my original thoughts, ideas, and literary musings in English, Hindi, and Urdu.
मुसलसल निगाहों से छलक रही है शराब ये जहां होश में आये तो आए कैसे वो कुछ कहते भी नहीं और सुनते भी नहीं उनके मतलब की बात उनको बताएं कैसे उन...
No comments:
Post a Comment